Poetry | Harish Darvesh | Basti,| UP
हरीश दरवेश

महँगा लिबास कार पे माला गुलाब की – हरीश दरवेश

महँगा लिबास कार पे माला गुलाब की

Ghazal | Harish Darvesh | Ghazal-go
Ghazal by Harish Darvesh

यह ग़ज़ल श्री हरीश दरवेश साहब की जदीद ग़ज़लों में से एक है। श्री हरीश दरवेश जी उत्तर प्रदेश के बस्ती नामक जगह से आते हैं। जनाब हरीश दरवेश साहब ने अदम गोंडवी और दुष्यंत कुमार जैसे गज़लकारों की परंपरा को आगे बढ़ाया है। यह उनकी ग़ज़ल में भी नज़र आता है। इस गज़ल का दूसरा शेर नौजवानों में शराब व नशे की लत के प्रति आगाह करता हुआ है। वो इक किरन भी देने के क़ाबिल नहीं हैं  यह शेर जुमलेबाज़ सियासतदानों की हकीकत बयान कर रहा है। कुल मिलाकर उनकी यह ग़ज़ल बेमिसाल बन पड़ी है। यह ग़ज़ल 221 2121 1221 212 बहर पर कही गई है।

महँगा लिबास कार पे माला गुलाब की
सेवक दिखा रहा है नज़ाकत नवाब की

भारत के नौनिहाल की तस्वीर देखिए
काँधे पे हुस्न, हाथ में बोतल शराब की

इस कोट पर दिखा कभी उस कोट पर दिखा
क्या ख़ूबियाँ बयान करूँ उस गुलाब की

वो इक किरन भी देने के क़ाबिल नहीं हैं जो
दुनिया दिखा रहे थे हमें आफ़ताब की

ये मोहतरम तो बोल के दिखते हैं इस तरह
जैसे के खा के आये थे गोली जुलाब की

बातें बता रही हैं मुहब्बत ही धर्म है
तेरी किताब की हों या मेरी किताब की

4 Comments

  1. DINESH BANSAL says:

    Bahut khoob hai.. har sher damdaar.. waah waah waaah

  2. Rohitashwa Mishra says:

    Waaaahhhh sir….

  3. राज़िक़ अंसारी says:

    बहुत खूब मोहतरम लाजवाब ग़ज़ल है

  4. हरिवल्लभ says:

    Behtareen gazal waahh

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