- दरवेश भारती

मस्ती-भरी वो उम्र सुहानी किधर गयी – दरवेश भारती

मस्ती-भरी वो उम्र सुहानी किधर गयी

मस्ती-भरी वो उम्र सुहानी किधर गयी, श्री दरवेश भारती जी यह ग़ज़ल उन सुहाने दिनों की याद दिलाती है जो हर व्यक्ति अपने साथ संजोकर रखना चाहता है। श्री दरवेश भारती जी ग़ज़ल की खासियत ही है कि वे बिना भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग करे गहरी बात बड़े आराम से कह जाते हैं। यह गज़ल एक लोकप्रिय बहर 221 2121 1221 212 पर कही गई है। इसी ग़ज़ल का एक शेर अपनी विरासत को सँभाल कर रखने की नसीहत दे रहा है।

पीपल है न ताल है, न है चौपाल ही कहीं
पुरखों की एक-एक निशानी किधर गयी

Darvesh Bharti | Ghazal-go.com | Poerry
Masti Bhari wo umar suhani

मस्ती-भरी वो उम्र सुहानी किधर गयी
वो रेत के घरों की निशानी किधर गयी

चिन्ताएँ जब भी हद से बढ़ीं सोचना पड़ा
थी जूझती जो इनसे जवानी किधर गयी

वो वलवले रहे न वो अब जोश ही रहा
दरिया-सरीखी अपनी रवानी किधर गयी

पीपल न ताल है, न है चौपाल ही कहीं
पुरखों की एक-एक निशानी किधर गयी

हालात देख आज के उभरा है ये सवाल
तुलसी, कबीर, सूर की बानी किधर गयी

आया बुढ़ापा सर पे तो हैरान हो के हम
‘मुड़-मुड़ के देखते हैं जवानी किधर गयी’

रहते थे जिसकी तोतली बातों पे मस्त हम
‘दरवेश’ होते ही वो सयानी, किधर गयी

दरवेश भारती

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