के पी अनमोल

खून ए दिल से लफ़्ज़ मुअत्तर करता है – के पी अनमोल

खून ए दिल से लफ़्ज़ मुअत्तर करता है क्या-क्या जादू एक सुखनवर करता है रात-रात भर खुद ही खुद में जग-जगकर दुनिया भर की सोच मुनव्वर करता है मेरा बेड़ा मँझधारों में उलझा के एक छलावा रोज़ समंदर करता है पेशानी पर बोसा तेरी चाहत का दिल पर कितने जंतर-मंतर करता है गैरों को मुस्कान …

के पी अनमोल

क़लम से छोड़ दिए कुछ निशान काग़ज़ पर – के पी अनमोल

क़लम से छोड़ दिए कुछ निशान काग़ज़ पर करेगा याद हमें अब जहान काग़ज़ पर मिला है जितना तज़ुर्बा हयात से हमको लिखा है उसको सुखन की ज़ुबान काग़ज़ पर बहुत हुआ कि हक़ीक़त की छत पे आ जाओ भरी है तुमने अभी तक उड़ान काग़ज़ पर यहाँ ग़रीब के हिस्से में झोंपड़ी भी नहीं …

राज़िक अंसारी

आंखों की वीरानी पढ़ कर देखो ना- राज़िक अंसारी

इंदौर के रहने वाले वरिष्ठ शायर मोहतरम राज़िक अंसारी जी उर्दू गज़लों में अच्छा खासा दख्ल रखते हैं, वे वर्षों से विभिन्न मंचों पर सक्रिय हैं। उनकी गज़लों को रेख्ता डॉट ओआरजी जैसे प्रतिष्ठित साइट में जगह मिली है। वे बदलते दौर के साथ अपनी ग़ज़लों को लेकर चले हैं, जो यह साबित करने के …

अय्यूब खान "बिस्मिल"

जब तअल्लुक़ आपसे बिल वास्ता हो जायेगा- अय्यूब खान “बिस्मिल”

जयपुर के जनाब अय्यूब खान “बिस्मिल” न सिर्फ इंटरनेट बल्कि मंचों और अपने क्षेत्र के एक सक्रिय ग़ज़लकार हैं, जो अपनी सशक्त ग़ज़लों के ज़रिए अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते आ रहे हैं। उर्दू ग़ज़लकारों के दरमियान अय्यूब खान “बिस्मिल” साहिब अपनी एक अलग ही पहचान रखते हैं। –शिज्जु शकूर जब तअल्लुक़ आपसे बिल वास्ता …

रवि शुक्ल

अगर ज़िन्दगी में न राहत मिले तो यकीं में न करना कमी, मांग लेना – रवि शुक्ला

बीकानेर, राजस्थान के रवि शुक्ल उत्तर पश्चिम रेलवे में कार्यरत हैं, ग़ज़लों पर उनकी जानकारी काबिले तारीफ़ है। श्री शुक्ल मसरूफ ज़िन्दगी में से कुछ पल निकाल कर अपने मनोभावों को अल्फ़ाज़ दिया करते हैं। पेश है उनकी एक ग़़ज़ल- – शिज्जु शकूर अगर ज़िन्दगी में न राहत मिले तो यकीं में न करना कमी, मांग …

समीर परिमल

जहाँ के रिवाजों की ऐसी की तैसी – समीर परिमल

पटना(बिहार) के श्री समीर परिमल जी वरिष्ठ ग़ज़लकार हैं, जो समाज में व्याप्त विसंगतियाँ चाहे वो सियासी हो या सामाजिक, की पुरज़ोर मुख़़ालिफत करते हैं। उनकी ग़ज़लें सत्य को ज़ोरदार तरीके से सामने रखती हैं। –शिज्जु शकूर जहाँ के रिवाजों की ऐसी की तैसी ज़मीं के ख़ुदाओं की ऐसी की तैसी पतीली है खाली वो …

शिज्जु शकूर

कितने अच्छे थे मेरा ऐब बताने वाले

कितने अच्छे थे मेरा ऐब बताने वाले वो मेरे दोस्त मुझे राह दिखाने वाले वक्त ने, काश! उन्हें रुकने दिया होता ज़रा साथ ही छोड़ गए साथ निभाने वाले मुफ़लिसी मक्र की छाई है सियाही अब भी पर बताओ हैं कहाँ शम्अ जलाने वाले अपने क़ातिल से शिकायत नहीं कोई मुझको कर गए ग़र्क मेरी कश्ती, …

शिज्जु शकूर

पत्ता था, सब्ज़, टूटके खिड़की में आ गया

पत्ता था, सब्ज़, टूटके खिड़की में आ गया हस्ती शजर की बाकी है मुझको बता गया माना हवाएँ तेज़ हैं मेरे खिलाफ़ भी लेकिन जुनून लड़ने का इस दिल पे छा गया खोने को पास कुछ भी नहीं था हयात में किसकी तलाफ़ी हो अभी तक मेरा क्या गया शायद ये दुनिया मेरे लिए थी …

शिज्जु शकूर

दिल ए नाकाम पर हँसी आई

दिल ए नाकाम पर हँसी आई तेरे इलज़ाम पर हँसी आई जिस मुहब्बत की आरज़ू थी बहुत उसकेे अंजाम पर हँसी आई दास्ताँ अपनी लिखने बैठा था अपने इस काम पर हँसी आई जिसमें तुमने कभी रखा था मुझे आज उस दाम पर हँसी आई मेरे क़ातिल का तज़किरा जो हुआ तो हर इक नाम …

शिज्जु शकूर

मैं जैसे-तैसे किसी बद-नज़र से निकला था

मैं जैसे-तैसे किसी बद-नज़र से निकला था कोई बला थी मैं जिसके असर से निकला था तू संग ओ खार की बातें तो कर रहा है बता कि पाँव बरहना कब अपने घर से निकला था सुना है मैंने कि कल उसपे संगबारी हुई मगर वो पहले भी तो उस नगर से निकला था बुझा-बुझा सा …