त्रिवेणी पाठक

ये न हो जाए कि सन्यास से हो कर गुज़रूँ – त्रिवेणी पाठक

ये न हो जाए कि सन्यास से हो कर गुज़रूँ ज़िन्दगी, जब भी तेरे पास से हो कर गुज़रूँ इक तो ये ज़िद कि मेरे लॉन में पत्थर भी बिछें उस पे हसरत कि हरी घास से हो कर गुज़रूँ आम इंसान हूँ खुद पर से भरोसा न उठे राह में जब भी किसी ख़ास …

त्रिवेणी पाठक

बातों-बातों में किसी ख़्वाब का नक्शा बन जाए – त्रिवेणी पाठक

बातों-बातों में किसी ख़्वाब का नक्शा बन जाए दो क़दम साथ चलो क्या पता रस्ता बन जाए मुझ पे लानत जो तुम्हें सोच के पाऊँ न सुक़ून वस्ल भी क्या कि जो दुनिया में तमाशा बन जाए इश्क़ वो है कि मै भर आँख जिसे भी देखूँ हर वो सूरत मेरी ख़ातिर तेरा चेहरा बन …

दिनेश कुमार बंसल

तरतीब से सजे दर-ओ-दीवार घर नहीं – दिनेश कुमार

तरतीब से सजे दर-ओ-दीवार घर नहीं सुख-दुख में तेरे साथ अगर हमसफ़र नहीं ऐसा नहीं कि राहे-सफ़र में शजर नहीं आसाँ ये ज़िन्दगी की मगर रहगुज़र नहीं उपदेश दूसरों को सभी लोग दे रहे ख़ुद उन पे जो अमल करे ऐसा बशर नहीं औरों के रंजो-ग़म से है अब किसको वास्ता पहले सी रौनकें किसी …

दिनेश कुमार बंसल

ख़तरे में जब वज़ीर था प्यादे बदल गए – दिनेश कुमार

ख़तरे में जब वज़ीर था प्यादे बदल गए मौक़ा परस्त दोस्त थे पाले बदल गए आये न लौट कर वे नशेमन में फिर कभी उड़ने को पर हुए तो परिन्दे बदल गए होंठों पे इनके आज खिलौनों की ज़िद नहीं ग़ुरबत का अर्थ जान के बच्चे बदल गए हालाँकि मैं वही हूँ मेरे भाई भी …

खुर्शीद ख़ैराड़ी

किस-किस बात का रोना रोया जाए – खुर्शीद खैराड़ी

किस-किस बात का रोना रोया जाए दरिया में हर ग़म को डुबोया जाए छाँट लिए जाएँ काँटे आँचल के फूलों का इक हार पिरोया जाए अपने जैसा तो न ज़माना होगा यार ज़माने जैसा होया जाए हमने जो अहसान किए लोगों पर इस गठरी को कब तक ढोया जाए सूख गई है रिश्तों की हरियाली …

खुर्शीद ख़ैराड़ी

तेरा क्या था गया जो खो फ़क़ीरे – ख़ुर्शीद ख़ैराड़ी

तेरा क्या था गया जो खो फ़क़ीरे तसल्ली ओढ़कर तू सो फ़क़ीरे भला कैसे क़बूलें भोर का सच है जस का तस अँधेरा तो फ़क़ीरे हैं झूठे जाति-मज़हब के ये झगड़े निभाना आदमीयत को फ़क़ीरे हर इक शय खाक़ में इक दिन मिलेगी तू इतनी हसरतें मत बो फ़क़ीरे फिर आईने के सच को झूठ …

जयनित मेहता

रेत पर फूल खिलाने आए – जयनित मेहता

रेत पर फूल खिलाने आए दश्त में कितने दीवाने आए मिल गया राह में बचपन का यार याद फिर गुज़रे ज़माने आए धूप के पंख निकल आए जब कुछ शजर जाल बिछाने आए एक दिन बेखुदी जो ले डूबी तब मेरे होश ठिकाने आए वक़्त बेवक्त भड़ककर, आँसू ग़म की सरकार गिराने आए नाम लिक्खा …

अय्यूब खान "बिस्मिल"

दिखाने को अक्सर वो हँसता बहुत है – अय्यूब ख़ान “बिस्मिल”

दिखाने को अक्सर वो हँसता बहुत है ग़मे ज़ीस्त से जो शनासा बहुत है यूँ ज़ख़्मों से अपना भी नाता बहुत है मगर दर्द दिल में छुपाया बहुत है मुहब्बत तो कर ली खुले आम लेकिन ज़माने की रस्मों से सहमा बहुत है करेगा भला कैसे सैराब हमको समंदर है लेकिन वो खारा बहुत है …

अय्यूब खान "बिस्मिल"

वफ़ा की उनसे चलो फिर से आरज़ू कर लें – अय्यूब खान “बिस्मिल”

वफ़ा की उनसे चलो फिर से आरज़ू कर लें यूँ तार तार मुहब्बत की आबरू कर लें हुआ जो चाक ये दिल क्यूँ न हम रफू कर लें बुलाओ उनको के फिर उनसे गुफ्तगू कर लें हाँ उनके ख़त को लगाने से क़ब्ल हाथ अपना लिया है पानी के पहले तो हम वुज़ू कर लें …

खुर्शीद ख़ैराड़ी

बात से बात निकालो तो कोई बात बने – ख़ुर्शीद खैराड़ी

जोधपुर के रहने वाले श्री खुर्शीद खैराड़ी जितनी कमाल की ग़ज़ले कहते हैं उतने ही सशक्त छंदकार भी हैं। इनका पूरा नाम महावीर सिंह हैं, आप भारतीय रेलवे में पर्यपेक्षक के पद पर कार्यरत हैं। इनकी रचनाएँ विभिन्न प्रिंट व वेब पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। –शिज्जु शकूर बात से बात निकालो तो कोई …