शिज्जु शकूर

किसी ने सल्तनत से जब बगावत की

किसी ने सल्तनत से जब बगावत की हवाएँ चल उठीं पुरज़ोर नफ़रत की समर पेड़ों पे आते आते आएँगे तभी तुम देखना तासीर कुदरत की मुझे चलना पड़ेगा दुनिया से बचकर कि अब मिलने लगी है दाद हिम्मत की यहाँ तो कुछ ज़हीनों की ज़बाँ पर भी जमी है कितनी ही पर्तें कुदूरत की मनाए …

शिज्जु शकूर

देखा है यूँ भी तज़्रबा करके

लफ़्जों से दर्द की दवा करके देखा है यूँ भी तज़्रबा करके तुम पे दहशत कोई मुसल्लत थी करना क्या था तुम आए क्या करके खींचता हूँ हयात को मैं फ़क़त कट रही है खुदा खुदा करके अपने माज़ी से है सवाल मेरा क्या मिला उनसे राबिता करके होश आ जाए नामुरादों को देखिए मुहतरम …

शिज्जु शकूर

जो तिरंगे में लिपटकर अपने घर लौट आए हैं उन सभी वीरों की रूहें जाविदानी हो गईं

निस्बतें इस दौर में यारो कहानी हो गईं और बातें भी उसूलों की पुरानी हो गईं मुफ़लिसी, बदकारियाँ, महँगाई, हिंसा, नफ़रतें ग़ालिबन अब ये बलाएँ आसमानी हो गईं दायरा मेरा बहुत छोटा है ये दुनिया बड़ी मेरी सारी दास्तानें लनतरानी हो गईं जो तिरंगे में लिपटकर अपने घर लौट आए हैं उन सभी वीरों की …

samra
शिज्जु शकूर

आप ही कोई सूरत बता दीजिए- शिज्जु शकूर

संग राहों से मेरी हटा दीजिए संग राहों से मेरी हटा दीजिए ये ग़ज़ल मैंने यानि शिज्जु शकूर ने सर्वप्रधम छत्तीसगढ़ उर्दू तंज़ीम के लिए कही थी फिर इसे ओपनबुक्स ऑनलाईन डॉट कॉम के मंच पर इस्लाह के लिए रखा था। यह मैंने बहर 212 212 212 212 यानि बहर ए मुतदारिक मुसम्मन सालिम पर …