- शरदिंदु मुखर्जी

पुस्तक समीक्षा : पृथ्वी के छोर पर, लेखक – शरदिंदु मुखर्जी

पृथ्वी के छोर पर: अंटार्कटिका का सर्द एवं रोमांचक अहसास

“अंटार्कटिका के वैज्ञानिक तथ्यों से इसे बोझिल बनाना मैंने उचित नहीं समझा। उसके लिए पाठक को बहुतेरे प्रामाणिक और उत्कृष्ट ग्रंथ उपलब्ध कराए जा सकते हैं।“

लेखक श्री शरदिंदु मुखर्जी जी द्वारा लिखी गयी किताब पृथ्वी के छोर पर का पूरा सार के इन शब्दों में छुपा हुआ है; कदाचित् उस हिमक्षेत्र के वैज्ञानिक तथ्य हमें उतना रोमांचित न करे जितना कि लेखक द्वारा उस परिवेश में बिताए गए वक्त की गाथा करती है। किसी भी संस्मरण की रोचकता लेखक द्वारा प्रयुक्त भाषा, शब्द एवं प्रस्तुतिकरण पर बहुत कुछ निर्भर करती है। किसी भी बात को बताने के लिए शब्दों का संतुलन इस किताब को विशिष्टता प्रदान करता है। लेखक को कुल चार दफा अंटार्कटिका के अभियान दल का हिस्सा बनने का मौका मिला, उन्होंने तीसरे अभियान दल की अगुवाई भी की थी। वे तीन बार भारतीय अभियान दल के सदस्य की हैसियत से और चौथी बार ब्राज़ील के अंटार्कटिका अभियान दल में ब्रिक्स समझौते के अनुसार भारतीय प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए थे।

शीर्षक – पृथ्वी के छोर पर(संस्मरण)
प्रकाशक – अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद
लेखक – शरदिंदु मुखर्जी

 

रोमांचक अनुभव

किताब के रोमांचक अनुभव की शुरूआत अध्याय “पहली पुकार” से ही शुरू हो गई थी। जब उन्हें अंटार्कटिका अभियान में चयन की खबर मिली वो दूनागिरि के आगे हिमालय की चोटियों पर थे। वापस उतरते समय लेखक दुर्गम रास्ते को बोल्डरों की बारिश के बीच अपनी जान बचाते हुए पार करते हैं।

इक्वेटर क्रॉसिंग सेरेमनी (Equator crossing ceremony) के बारे में जानकर बड़ी हैरत हुई और अच्छा भी लगा। तमाम संघर्षों एवं उतार चढ़ाव के बीच, अपने करीबी साथ हों या न हों ज़िन्दगी हमें सेलिब्रेशन का मौका ज़रूर देती है। मेरा यह विश्वास पुख्ता हुआ कि जीवन के तकलीफदेह सफर में किसी भी मोड़ पर छोटी सी छोटी बातों में खुशियाँ ढूँढी जा सकती है।

“जब गैस जलाने गए तो जली ही नहीं, वास्तव में द्रवीय गैस सिलेण्डर के अंदर जम गई थी”

यह पढ़ते हुए ही बदन में सिहरन सी दौड़ गई थी न जाने उस स्थान पर वातावरण कैसा रहा होगा। किताब पढ़ते-पढ़ते जब मैंने भाग-5 “तनाव से भरे हुए कुछ घंटे” पढ़ना शुरू किया। मुझे महसूस मैं हर एक वाकिए के बाद रोमांचित हुआ जा रहा था। समंदर का वो लंबा सफर, अशांत समुद्र का जहाज पर असर। साथियों पर सी-सिकनेस का प्रभाव और इन तमाम तकलीफों को झेलने के बाद आइस पैक पर जहाज का लंगर डालना। लेखक समेत अभियान दल के अन्य सदस्यों का अंटार्कटिका पर कदम रखना, बर्फीली आँधी, मतिभ्रम फिर हादसों से सकुशल बाहर आने के बाद निर्जलीकरण(Dehydration) से बचने के लिए बर्फ को गलाकर उस पानी से चाय बनाकर पीना। ये तमाम वाकियात पढ़कर एक अद्भुत अनुभूति हुई।

इस अभियान दल के एक सदस्य पर अंटार्कटिका के हाइजीनिक वातावरण में भी 103 डिग्री फारेहाइट बुखार होना आश्चर्यजनक लगा और इसका इलाज उससे ज़्यादा हैरान करने वाला था।

आश्चर्यजनक खगोलीय घटना

“आकाश में आग की लपटें” में वर्णित घटना एक हैरत भरी परिस्थितिजन्य घटना थी, जिससे लेखक पहली बार गुज़रे थे। कुछ-कुछ उसी तरह की आश्चर्यजनक खगोलीय घटना का वर्णन लेखक ने “वह अलौकिक हेडलाइट” में किया है। मेरा दावा है, इस अविश्वसनीय घटना के बारे में पढ़कर पाठक शर्तिया हैरान हो जाएँगे। क्योंकि, शायद ऐसी अलौकिक घटनाएँ आप तभी देख पाएँगे जब अंटार्कटिका में होंगे। वो भी कुछ खास परिस्थितियों में; या फिर आप तभी महसूस कर सकते हैं जब यह किताब पढ़ रहे होंगे। “पृथ्वी के छोर पर” इस तरह की कई घटनाओं का संकलन है जिनसे लेखक अपनी चारों अंटार्कटिका यात्राओं के दौरान रू-ब-रू हुए थे; ऑरोरा ऑस्ट्रेलिस(#Aurora Australis) एक और अंटार्कटिका से जुड़ी हुई दिव्य खगोलीय घटना है, लेखक अपने दूसरे अभियान के दौरान जिसके साक्षी बने।

अंटार्कटिका के सापेक्ष प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन के प्रति लेखक की चिंता, आज के उच्च शिक्षित युवाओं में निजी स्वार्थ और मौद्रिकता को सामाजिक दायित्वों पर तरजीह देने के चलन के प्रति नाखुशी भी गाहे बगाहे इस किताब में नज़र आ जाती है।

अंटार्कटिका वो सुदूर क्षेत्र हैं जो मानव आबादी से हज़ारों किलोमीटर दूर है। संभवतः वहाँ बर्फ के नीचे प्राकृतिक संपदा का अकूत भंडार होगा। वह ऐसा क्षेत्र है जहाँ किसी भी देश का आधिपत्य नहीं है। लेखक के शब्दों में-

”अंटार्कटिका किसी राष्ट्र विशेष की ज़मीं न होते हुए भी अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय की दृष्टि में अनोखी प्रयोगशाला थी”

रोमांच के शौकीन पाठकों, विशेषकर जिनकी अभिरूचि पर्यटन में है, लेखक के इन चारों यात्राओं के संस्मरण पढ़कर इस “अनोखी प्रयोगशाला” अंटार्कटिका को करीब से महसूस कर सकते हैं।

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