निलेश 'नूर'

सीने से चिमटा कर रोये – निलेश नूर

सीने से चिमटा कर रोये

आदरणीय निलेश “नूर” जी की इस ग़ज़ल के शिल्प पर उस्ताद और वरिष्ठ ग़ज़लकारों नें विस्तार से अपनी बात कही है। उनके अपने तर्क हैं निलेश नूर साहिब के अपने। यदि ग़ज़ल में आप कोई प्रयोग करते हैं तो आपके पास तर्क भी होने चाहिए। मैं निजी तौर पर श्री निलेश नूर जी की तर्क करने की क्षमता का सम्मान करता हूँ। तमाम तन्कीद को यदि भुला दिया जाए तो यह ग़ज़ल भावपूर्ण बन पड़ा है। उनके द्वारा कुछ बिंबों से आपका मुतमईन न होना आपके निजी विचार हो सकते हैं। मगर हर तर्क के बावजूद यह एक बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है। इस ग़ज़ल का हर शे’र अपना असर छोड़ने में कामयाब है।

मात्रिक बहर में किन्ही भी 222 को 1212, 2121, 2112 करने की छूट रहती है और मैंने इसी का लाभ लिया है। इस विषय में अरूज की कोई भी किताब देखी जा सकती है अथवा कक्षा में उपलब्ध लेख पढ़ें जा सकते हैं। इस बहर में उस्ताद शाइरों की लाखों ग़ज़लें भी रेफेरेंस के काम आ सकती हैं।
कुछ दिन तो बसो मेरी यादों में ,,अलीम
गरज बरस प्यासी धरती पर,,, निदा
कभी कभी यूँ भी हमनें ,, निदा
किसी भी बहर में ये 12 सिर्फ अंक हैं। असली रूह है लय। अगर लय ठीक है तो बहर ठीक है – निलेश नूर

सीने से चिमटा कर रोये,
ख़ुद को गले लगा कर रोये.
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आईना जिस को दिखलाया,
उस को रोता पा कर रोये.
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इक बस्ते की चोर जेब में,
ख़त तेरा दफ़ना कर रोये.
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इक मुद्दत से ज़ह’न है ख़ाली,
हर मुश्किल सुलझा कर रोये.
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तेरी दुनिया, अजब खिलौना,
खो कर रोये, पा कर रोये.
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सीखे कब आदाब-ए-इबादत,
बस,,,, दामन फैला कर रोये.
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हम असीर हैं अपनी अना के,
लेकिन मौका पा कर रोये.
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सूरज जैसा “नूर” है लेकिन,
जुगनू एक उड़ा कर रोये.

असीर –  कैदी

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1 Comment

  1. Dinesh Bansal says:

    Bahut khoob.. Nilesh sir ji.. kya baat hai.. waah waah

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