Ghazal Go

आज के ग़ज़ल गो

शराफ़त हार जाती है – खुर्शीद अनवर

पेश है ग़ज़ल गो खुर्शीद अनवर की एक ग़ज़ल

शराफत हार जाती है

ये अक्सर मैं ने देखा है शराफ़त हार जाती है
अगर लहजे में तल्ख़ी हो तो दुनिया सर झुकाती है

ज़माने की यह गर्दिश जब भी अपना रंग दिखाती है
तो ज़रदारों ज़मीदारों को भी नौकर बनती है

कमाने को यहां रुपया तवाइफ़ भी कमाती है
मगर उस का तो क्या कहना जो पत्थर ढो के लाती है

न लौटें वक्त पर बच्चे तो यह मां बाप से पूछो
हो चाहे मख़मली बिस्तर उन्हें क्या नींद आती है?

शहंशाहों के महलों में अबाबीलों के मस्कन हैं
अमीरों की अमीरी पर ग़रीबी मुस्कुराती है

मसाइब के पहाड़ों से यूँ डर कर भागना कैसा?
अज़ाइम की बुलन्दी से मुसीबत भाग जाती है

-खुर्शीद अनवर

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