तेरी ज़िद दुरुस्त भी है मगर – डॉ. मंजु कछावा ‘अना’

तेरी ज़िद दुरुस्त भी है मगर मेरा अपना भी तो उसूल है जो तेरी निगाह में अहम है वो मेरी नज़र में फ़ुज़ूल है कोई वाक़या किसी फूल का न सुनाओ अहले चमन मुझे मेरी आँख आज है शबनमी मेरा दिल भी आज मलूल है तू दयार ए ग़म में धकेल दे,या मसर्रतों का जहान …