Giriraj Bhandari, Ghazal, Zindagi
गिरिराज भंडारी

है तर्कों की कहाँ हद जानता हूँ – गिरिराज भंडारी

है तर्कों की कहाँ हद जानता हूँ

गिरिराज भंडारी जी की ग़ज़ल हमेशा सच्चाई के करीब होती है। तर्कों कहाँ हद जानता हूँ में उनका अनुभव और लोगों को देखने का नज़रिया दिखाई देता है। करें आकाश को छूने के जो दावे, मैं उनका मक़सद जानता हूँ इस शेर में उनके अनुभव की झलक दिखाई देती है। यह ग़ज़ल उन्होंने बहर 1222 1222 122 में कही है।
Giriraj Bhandari, Ghazal, ZindagiGiriraj Bhandari, Ghazal, Zindagi

है तर्कों की कहाँ हद जानता हूँ
मुबाहिस का मैं मक़्सद जानता हूँ

करें आकाश छूने के जो दावे
मैं उनका भी सही क़द जानता हूँ

बबूलों की कहानी क्या कहूँ मैं
पला बरगद में, बरगद जानता हूँ

बदलता है जहाँ, पल पल यहाँ क्यूँ
मै उस कारण को शायद जानता हूँ

पसीने पर जहाँ चर्चा हुआ कल
वो कमरा, ए सी, मसनद जानता हूँ

यक़ीनन कोशिशें नाकाम होंगीं
मै उनके तीरों की जद, जानता हूँ

मिरा गिरना किसी की है मसर्रत
हुआ है कौन गदगद, जानता हूँ

शब्दार्थ-
मुबाहिस – बहस करने वाला, मसनद – गद्दी,  मसर्रत – खुशी

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *