डॉ मंजु कछावा 'अना'

तेरी ज़िद दुरुस्त भी है मगर – डॉ. मंजु कछावा ‘अना’

तेरी ज़िद दुरुस्त भी है मगर मेरा अपना भी तो उसूल है
जो तेरी निगाह में अहम है वो मेरी नज़र में फ़ुज़ूल है

कोई वाक़या किसी फूल का न सुनाओ अहले चमन मुझे
मेरी आँख आज है शबनमी मेरा दिल भी आज मलूल है

तू दयार ए ग़म में धकेल दे,या मसर्रतों का जहान दे
तेरा फ़ैसला ऐ मेरे ख़ुदा, मुझे जान ओ दिल से क़बूल है

मैं हूँ ऐसे मोड़ पे ज़ीस्त के न ख़ुशी जहाँ न कोई है ग़म
मैं चमन में अब नहीं झाँकती कोई फूल है कि बबूल है

ये कलंदरों की अलामतें है कलंदरों का उसूल भी
जिसे ताज कहता है ये जहां वो हमारे क़दमों की धूल है

डॉ. मंजु कछावा ‘अना’

 

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2 Comments

  1. ravi shukla says:

    बहुत बेहतरीन ग़ज़ल। मुबारक अना साहिबा

  2. ravi shukla says:

    कमाल के अशआर कहें है आपने दिली बधाई अना साहिबा

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