- रोहिताश्व मिश्र

वक़्त आने पे किधर से भी निकल जाऊँगा – रोहिताश्व मिश्र

वक़्त आने पे किधर, ग़ज़ल, रोहिताश्व मिश्रा

बहर 2122 1122 1122 22 बहर पर कही गई वक़्त आने पे किधर, ग़ज़ल, रोहिताश्व मिश्रा जी की एक खूबसूरत ग़ज़ल है। रोहिताश्व मिश्रा एक प्रतिभाशाली ग़ज़ल गो हैं, जो साथी ग़ज़ल गो और ग़ज़ल प्रेमियों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। खूबसूरत अशआर से सजी इस ग़ज़ल को पढ़कर अपनी प्रतिक्रियाओं से नवाज़ें।

रोहिताश्व मिश्रा | गज़ल | ग़ज़ल गो

वक़्त आने पे किधर से भी निकल जाऊँगा,
मैं तो मिट्टी हूँ हर इक शेप में ढल जाऊँगा।

आबजू तू ये बता रूठ के जायेगा किधर,
में तो दरिया हूँ नई रह पे निकल जाऊँगा

ऐ दरख़्त अपनी अना को तू बचा के ही रख,
मैं तो पौधा हूँ गिरूँगा तो संभल जाऊँगा।

मुझ को चलने दे मेरे देस की ही मिट्टी पर,
संग-ए-मरमर पे चलूँगा तो फिसल जाऊँगा।

में तो पर्वानः हूँ गर जिस्म मुझे और मिले,
शम्अ के इश्क़ में सौ बार भी जल जाऊँगा

3 thoughts on “वक़्त आने पे किधर से भी निकल जाऊँगा – रोहिताश्व मिश्र

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