Ghazal-go, Muntazir Firozabaadi, Kalaam
मुन्तज़िर फ़िरोज़ाबादी

वक़्ते-क़याम और भी कुछ तो हो सकता था – मुन्तज़िर फ़िरोज़ाबादी

वक़्ते-क़याम और भी कुछ तो हो सकता था

मुन्तज़िर साहब उन ग़ज़ल-गो की राह पर हैं, जिनकी ग़ज़लें परम्परा और आधुनिकता के बीच पुल की तरह हैं। शायरी में पारम्परिक लहजे की लचक बरकरार रखते हुए नए समय की बातें करना आसान नहीं होता। इसी मुश्किल काम को अंजाम दे रहे हैं ये। एक मेआरी शेर कहने के लिए बरसों की साधना और ख़ुदा का ख़ास करम चाहिए होता है, मुन्तज़िर साहब के यहाँ इन दोनों झलक मिलती है। यानी एक अच्छा शायर कहलाने की लिए जिन चीज़ों की ज़रूरत होती है, वह है इस इनके पास।
सब काम था तमाम मुहब्बत तमाम थी
यानी तमाम और भी कुछ हो तो सकता था
इस शेर की कहन यह कह रही है कि मुन्तज़िर भविष्य के एक उम्दा शायर हैं।
के पी अनमोल

वक़्ते-क़याम और भी कुछ तो हो सकता था
मैं हूँ गुलाम और भी कुछ तो हो सकता था

हर बात पे यूँ बेरुखी भी अच्छी तो नहीं
तर्ज़े-कलाम और भी कुछ तो हो सकता था

सब काम था तमाम मुहब्बत तमाम थी
यानी तमाम और भी कुछ तो हो सकता था

मेरा दिलो-दिमाग मुहब्बत से था भरा
मेरे को काम और भी कुछ तो हो सकता था

कहते हैं मुझको शहर के सब लोग ‘मुन्तज़िर’
क्यूँ मेरा नाम और भी कुछ तो हो सकता था

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3 Comments

  1. Rohitashwa Mishra says:

    Waaaaahhhh….🙏🙏💐💐

  2. DINESH BANSAL says:

    बहुत ख़ूब। वाह वाह

  3. Ravi kumar shukla says:

    बहुत खूब मुंतज़िर साहब । मुबारक

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