- सीमा शर्मा 'मेरठी'

ज़िंदगी की डोर है इक पेड़ पर अटकी हुई – सीमा शर्मा ‘मेरठी’

ज़िंदगी की डोर है इक पेड़ पर अटकी हुई

सीमा शर्मा ‘मेरठी’ जी ग़ज़ल की दुनिया में पिछले कई वर्षों से सक्रिय हैं। इनकी ग़ज़लें शिल्प, कहन और प्रस्तुति के लिहाज से कसी हुई होती हैं। इसी का एक उदाहरण है यह ग़ज़ल। इस ग़ज़ल में प्रयुक्त बिम्ब व प्रतीक आश्चर्य चकित कर देते हैं, यही ग़ज़ल का हुस्न है। आसमाँ के पेड़ पर सूरज खिला कचनार का कहाँ आसमाँ और कहाँ कचनार का पेड़, लेकिन वाह इन बिम्बो के प्रयोग ने ग़ज़ल के हुस्न को बढ़ा दिया है। नींद और कस्तूरी का सामंजस्य ख्वाबीदा(नींद में डूबी हुई) आँखों में उभरने वाले खयालों को इंगित करता है। यह ग़ज़ल सीमा शर्मा जी ने बहर 2122 2122 2122 212 पर लिखी है।

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ज़िंदगी की डोर है इक पेड़ पर अटकी हुई
ज्यूँ पतंग आकाश से गिर कर कोई लटकी हुई

आसमाँ के पेड़ पर सूरज खिला कचनार का
शाख़ के तन पर कली है धूप की चटकी हुई

खुशबुएँ बाकी हैं उल्फ़त के फ़सानो की अभी
जिस्मे गुल मुरझा चुका बस रूह है भटकी हुई

तुम तो मुझको छोड़कर इक पल में आगे बढ़ गए
मैं सुई सी आज तक उस पल पे हूँ अटकी हुई

मैं वफ़ा, दौरे जफ़ा में मिल चुकी अब खाक़ में
इश्क़ के हाथों रिदा से धूल सी झटकी हुई

तुम हो कस्तूरी तुम्हे यूँ ढूंढती हूँ ख़्वाब में
नींद की हिरनी हो जैसे दश्त में भटकी हुई

शक़्ल गीली रेत की मैं कर चुकी हूँ इख़्तियार
मौज सागर की हूँ साहिल पर कोई पटकी हुई

घूमती रहती हैं तेरे गिर्द धड़कन की सुई
तेरी ख्वाहिश पर है मंजिल ज़ह्न की अटकी हुई

शाम होते ही तलब लगती है चाय ए इश्क़ की
एक इक चुस्की में तेरी याद है सटकी हुई

दो कदम आगे की उससे सोचकर चलती हूँ मैं
वक़्त की नज़रो में “सीमा” इस सबब खटकी हुई

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